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इन मृदु दारोगाओं का नाम सुनते ही गीली हो जाती थी अपराधियों की चड्ढी

: कुख्‍यात अपराधी राजू भटनागर को इलाहाबाद में घेरने वाले आरपी सिंह अब प्रकाश सिंह के शिष्‍यत्‍व में : बीएन सिंह की शोहरत आलमबाग से लेकर जौनपुर, काशी तक दमकती थी : बब्‍बन सिंह और राजाराम पाल किसी बब्‍बर शेर से कम नहीं थे : लौर तो अपने बाल खुद ही काटते थे : लखनऊ के दारोगा- चार :

कुमार सौवीर

लखनऊ : विष्‍णु मिश्र जैसे लोगों की बात छोड़ दीजिए। पुलिस की नौकरी में यह नराधम माने जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे तिन-टंगा त्रिपाठी, विनय वर्मा, ओपी पांडे, अतुल सक्‍सेना और राकेश शंकर वगैरह बेगैरत लोग। इन लोगों ने तो वाकई पुलिस विभाग की नाक ही काट डाली थी। सच कहें तो यह लोग पुलिस के रक्षक नहीं, बल्कि हत्‍यारे, लुटेरे ही हैं। पैसा के लिए कुछ भी करने के लिए जो ताकत, रणनीति और साहस का प्रदर्शन जितना यह लोग कर सकते हैं, वह बेमिसाल है। बालू से तेल निकालने तो कोई इनसे देखे।

लेकिन जिन लोगों के नाम से पुलिस महकमा चमकता-दमकता है, उन दारोगाओं का नाम आज भी लोगों के जेहन में बरबस ध्रुव-नक्षत्र की तरह गूंजता है। इन लोगों ने ही लखनऊ के बाशिंदों को एक नया सुकून भरा माहौल दिया है। जिसमें अपराध कम से कम, और सुरक्षा अधिकतम रही है।

तो पहले नाम सुन लीजिए रामप्रताप सिंह का, जिसको आमतौर पर लोग आरपी सिंह कहते थे। हजरतंगज कोतवाली पर उस शख्‍स का गजब कब्‍जा था। करीब छह फीट ऊंचाई। लाजवाब कद-काठी, जनता के साथ बात करते वक्‍त जुबान पर मिश्री, अपराधियों के साथ बात-बात पर गाली। हरदोई के सीओ सिटी से रिटायर हुए आरपी सिंह।

जिनकी उम्र 45 के आसपास हो चुकी है, उन्‍हें पता होगा कि राजू भटनागर नामक एक दुर्दांत हत्‍यारे का नाम तीन दशक पहले किसी दहशत का पर्याय हुआ करता था। तब के एसपी एसएन सिंह वगैरह के साथ मिल कर आरपी सिंह ने राजू को इलाहाबाद के एक गैरेज में घेरा, और वहीं उसकी अन्‍त्‍येष्टि कर डाली। डिप्‍टी एसपी के पद से रिटायर होकर आरपी सिंह आजकल प्रदेश के पूर्व डीजीपी पद्मश्री प्रकाश सिंह के साथ हैं।

बीएन सिंह। आलमबाग कोतवाली से यह शख्‍स राजधानी में चमका। राजधानी में होनी वाली आपराधिक हरकतों पर गहरी निगहबानी के लिए तक के पुलिस मुखियाओं की खास पसंद हुआ करते थे बीएन सिंह। अपराधियों की रग-रग और उनके चरित्र को खूब पहचानने वाले बीएन सिंह ने अपनी सारी जानकारियों को और भी पैना किया, और फिर उसे केवल पुलिस महकमे को समृद्ध करते रहे। हालांकि बाद में उसके बाद यही शख्‍स बनारस, जौनपुर, सोनभद्र, मिर्जापुर तक घूमता रहा, और टोपी-क्रेसी को सबसे ज्‍यादा मजबूत किया। खास बात तो यह कि बीएन सिंह का नाम कभी भी किसी फर्जी एनकाउंटर में नहीं आया। बीएन सिंह बेलौस, बेदाग और कुशल प्रशासक रहे हैं।

बब्‍बन सिंह ने आलमबाग, कृष्‍णानगर और चौक समेत कई कोतवालियों में प्रभार सम्‍भाला। और हर जगह अपने नाम का डंका बजाया। इतना ही नहीं, बब्‍बन सिंह की पोस्टिंग भले ही कहीं रही हो, किसी भी संवेदनशील हादसे पर बब्‍बन की मौजूदगी अनिवार्य समझी-मानी जाती थी। अपराध और अपराधी ही नहीं, बल्कि अपराध की प्रत्‍येक प्रवृत्ति-क्रियाविधि को बारीकी से समझने वाले बब्‍बन सिंह, बीएन सिंह और आरपी सिंह का काम अचूक हुआ करता था।

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बड़ा दारोगा

यही बात राजाराम पाल की थी। बेशुमार मेहनत करते थे राजाराम। सुबह से लेकर शाम तक मुखबिरों से सूचनाएं इकट्ठा करने के बाद राजाराम की दिनचर्या रात 11 बजे से तड़के-भोर तक अपराधियों की तलाशी और छापामारी में बीतती थी। हां, मुखबिरों को अपनी जेब से पैसा देने में राजाराम को कोई भी गुरेज नहीं थी, और उनकी जेब तक यह रकम उनकी अवैध कमाई से आती थी। कुल ऊपरी कमाई का 90 फीसदी पैसा अपने और अफसरों की सेवा में, और बाकी 10 फीसदी मुखबिरों के जीवन-निर्वाह भत्‍ता के तौर पर खर्च होता था।

लेकिन अचानक अक्षयवर मल्‍ल नामक एक नेता को लेकर राजाराम की ठन गयी। मल्‍ल का नाम मुलायम सिंह यादव के करीबियों में शामिल था। एक बार प्रदर्शन हुआ, तो उसमें मल्‍ल की मौत हो गयी। तब उसके साथी रविदास मेहरोत्रा ने मल्‍ल की मौत का ठीकरा राजाराम पर फोड़ दिया। राजाराम को उस वक्‍त कैंसर था, इसलिए वह काफी चिडचिढ़ा और मुंहफट-बदतमीज भी हो चुका था। एक दिन यूं ही बातचीत में राजाराम पाल ने अपने दिल की बात जाहिर कर दी। सच भी यही था कि मल्‍ल की मौत की कारण दीगर वजहों से हुई थी, राजाराम उसका कारण नहीं था। मुझे लगा कि उसकी पीड़ा भी एक खबर है। मैंने पर खबर लिखी। तब मैं दैनिक जागरण के लखनऊ संस्‍करण में वरिष्‍ठ संवाददाता हुआ करता था।

लेकिन मेरे इस प्रयास पर रविदास मेहरोत्रा ने मेरे खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मेरे खिलाफ जागरण के दफ्तर में जमकर प्रदर्शन हुआ। रविदास के नेतृत्‍व में। जागरण के कई लोग भी मुझसे खासे खार खाये बैठे रहते थे। सब ने मिल कर सम्‍पादक विनोद शुक्‍ला के कान भरे। इसी बीच तीन दिन हो गये, मैंने किसी से भी अपना स्‍पष्‍टीकरण नहीं दिया। नतीजा, लोग मुझसे खफा होने लगे। बात जागरण के दफ्तर से निकल कर बाहर निकलने लगी। अचानक आरपी सिंह जैसे कई वरिष्‍ठ दारोगा-कोतवाल और बड़े दारोगा यानी दो आईपीएस मेरे पक्ष में मेरे सम्‍पादक के पास पहुंचे और मल्‍ल की मौत की असलियत जाहिर कर दी। विनोद शुक्‍ला को बताया गया कि सच यही है कि मल्‍ल की मौत में राजाराम पाल के चलते नहीं हुई, और दूसरी बात यह कि कुमार सौवीर ने जो कुछ भी लिखा है, वह शब्‍दश: सच है।

बात खत्‍म हो गयी। उसी दिन शाम को विनोद शुक्‍ला मुझे लेकर एमबी क्‍लब ले गये और जमकर दारू पिलायी। हां, हां, कबाब और मुर्गा भी खिलाया। (क्रमश:)

जरा राकेश शंकर की कहानी सुुन लीजिए। इस बारे में www.meribitiya.com से इस बड़े दारोगा यानी आईपीएस अफसर राकेश शंकर से बातचीत की। जरा सुनिये कि क्‍या-क्‍या धमकी नहीं दे रहे हैं राकेश शंकर।

इतना ही नहीं, जब राकेश शंकर को अहसास हो गया कि मामला अब तक पहुंच गया है, तो आखिर में किस तरह विनीत भाव में गिड़गिड़ाने लगे बड़े दारोगा राकेश शंकर। इस बातचीत को सुनने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:- देख लो न, कि कैसे अंधेरगर्दी मचा रखा है बड़े दारोगा राकेश शंकर ने

राकेश शंकर की करतूत पर सबसे पहले प्रकाशित हुई खबर को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:- इस बड़े दारोगा की गुण्‍डागर्दी तो देखिये। जीना हराम कर रखा है इन अनाथ बच्चियों का


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