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एक अखबार था सूचना-पट्ट। सम्‍पादक थी वेश्‍याओं के कोठे की मालकिन मौसी बिबिया

: कमाल की थी बिबिया की डिबिया, भरभरा कर बाहर छिटक पड़े एक से एक बड़े पत्रकार : महंगा जरूर था, लेकिन वेश्‍याओं के धंधे को नये तरीके से सुरक्षित करने में बिबिया ने गजब काम किया : एक ही दांव में अफसर, पत्रकार और पुलिस तक चारोंखाने चित्‍त : तवायफों के कोठे वाले पत्रकार- चार :

कुमार सौवीर

लखनऊ :  ( गतांक से आगे ) बेहाल होती जा रही कॉल-गर्ल्‍स के लिए बिबिया किसी देवदूत से कम नहीं थी। लखनऊ में देह-व्‍यापार करने वाली हर वेश्‍या को बिबिया ने एकजुट किया था। मकसद था कि इन वेश्‍याओं को उनका डेरा सुरक्षित कराने की जुगत भिड़ाया जाए। इसके लिए बिबिया ने बेहिसाब मेहनत की। चूंकि वह खुद भी वेश्‍या ही नहीं थी, बल्कि उसका अपना खुद का एक बड़ा कोठा था, जिसकी संचालिका थी बिबिया। वेश्‍याओं और उनके ग्राहकों के हर दन्‍ध-फन्‍ध की हर-एक बारीकियों से वाकिफ थी बिबिया, इसलिए को अपने काम में खासी सहूलियत हो गयी।  हालांकि अब कोठे खत्‍म होते जा रहे थे, लेकिन इधर-उधर छितरायी वेश्‍याओं को उसने एकजुट करने की कोशिश की। और वह अपने इस मिशन में सफल हो गयी।

बताते हैं कि बिबिया उसके गिरोह में तीन सौ से ज्‍यादा वेश्‍याएं शामिल थीं। बिबिया ने उनके दलालों की फीस नियंत्रित की थी। नेताओं और दबंगों की लूट, छीनाझपटी, और जहां-तहां दैहिक-शोषण को भी नियंत्रित किया। सबसे बड़ी बात यह कि बिबिया ने अपने गिरोह की वेश्‍याओं को बिबिया नामक एक मजबूत सुरक्षा कवच मुहैया करा दिया।  वह देह-व्‍यापार में लिप्‍त वेश्‍याओं से न्‍यूनतम और अधिकतम मूल्‍य पर चर्चा नहीं करती थी, लेकिन इतना जरूर तय कर देती थी कि कोई भी व्‍यक्ति किसी वेश्‍या को तंग न करे। ऐसा भी न हो कि वेश्‍याओं से नकद उगाही भी की जाए, और उनका बदन भी बिना फीस के इस्‍तेमाल किया जाए।

4पीएम अखबार में हुए तथाकथित अभिव्‍यक्ति पर हमले का असली नजरा देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कर इस वीडियो को निहारिये:-

असलियत तो देखिये जरा

अपने इस धंधे के लिए बिबिया ने कई नियम बनाये और साथी वेश्‍याओं के लिए सहूलियतें मुहैया करायी थीं। इसके लिए बिबिया ने इन महिलाओं से अपनी फीस उगाहना शुरू कर दिया। हालांकि यह फीस काफी ज्‍यादा होती थी, लेकिन उसके बाद किसी भी तरह के बवाल या झंझट से बिबिया उन लोगों को बचाती भी थी। छोटे नेताओं और निचले दर्जे के पुलिसवालों को ज्‍यादा भाव नहीं दिया। वह सीधे ऊंचे पायदान में बैठे लोगों के सीधे सम्‍पर्क साधने लगी। पुलिस मुख्‍यालय और सचिवालयों के कमरों से लेकर होटलों-गेस्‍टहाउसों में उसकी आमद-रफ्त तेज हो गयी।

अपने इस नये पैंतरों से शुरूआत में तो वह सफल भी हुई। हुआ यह था कि अपनी कार्यशैली के तहत बिबिया ने कुछ स्‍वयंसेवक वेश्‍याओं की भी सेवाएं ले रखी थीं, जो नेताओं और दबंग लोगों के साथ ही पुलिस की हवस पूरी करने के लिए बिलकुल पेशेवर अंदाज में तैयार रहती थीं। इतना ही नहीं, किसी कुशल समाजसेवी की तरह बिबिया अपने ऊंचे सम्‍पर्कों तक नियमित रूप से डाली-तोहफे भेजा करती थी। ऐसे में छोटे-मोटे लोगों की लिप्‍सा काफी नियंत्रित हुई। और बड़े लोगों से उसकी करीबियां बढ़ने लगीं।

पहले जिस शख्‍स को जब भी मन होता था, वह वेश्‍याओं को नोंचना शुरू कर देता था। लेकिन बिबिया ने इस काम के लिए हफ्ता बांधना शुरू कर दिया। जाहिर है कि वेश्‍याओं के शोषण के अवसर कम हुए। लेकिन इसके बावजूद चूंकि बिबिया बेहद शातिर वेश्‍या थी, इसलिए वेश्‍याओं से होने वाली उगाहियों में अपना हिस्‍सा सबसे ज्‍यादा रखा। इससे दलालों का हिस्‍सा कम या बिलकुल ही बंद होने लगा। हिस्‍सा मांगने पर दलालों की पिटाई तक होने लगी। दलालों को लगता था कि उनके देखते ही देखते, साल भर में ही बिबिया कई मकानों की मालकिन बन गयी, जबकि वह दलाल के दलाल ही हो गये। दलाल छटपटाने लगे। उन्‍होंने दारोगाओं को साधा और फिर हमला होने लगा बिबिया पर।

बिबिया अभी दारोगा और अपराधियों के गंठजोड़ का समाधान खोजना ही शुरू किया था कि इसी बीच एक नया खतरा मंडराने लगा। वह था पत्रकार। अखबार मिशन के बजाय अब दल्‍लागिरी और बदमाशी पर पैसा उगाने वालों की तरह बिलकुल कुकुरमुत्‍ते की तरह छाने लगे। ऐसे पत्रकारों का कहना था कि जब नेताओं, दबंगों और पुलिस वालों तक पैसा जा सकता है, तो पत्रकारों को क्‍यों नहीं, क्‍योंकि वे समाज के जागरूक और बौद्धिक ताकत हैं। ऐसे पत्रकार चाहते थे कि उन्‍हें भी नियमित रूप से उपकृत किया जाना चाहिए।

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पत्रकार पत्रकारिता

सच यह था कि बिबिया को इन नये नरपिशाचों के सामने हड्डी फेंकने में कोई भी गुरेज नहीं था। लेकिन समस्‍या यह थी कि लगातार अखबारों की तादात में इजाफा होता ही जा रहा था, उसी हिसाब से पत्रकार भी बढ़ते जा रहे थे। हर शख्‍स के पास मुंह होता है, और उसकी अलग-अलग अपेक्षाएं होती हैं। ऐसे में हर पत्रकार की ख्‍वाहिशों को पूरा कर पाना नामुमकिन था।

ऐसे में बिबिया ने एक नायाब दांव चलाया। उसने एक अखबार शुरू किया था। अखबार का नाम था सूचना-पट्ट। अब बिबिया अफसरों के दफ्तरों में पत्रकार के चोले में आने लगी। शुरूआत में तो वह खुद ही अफसरों के पास अखबार पहुंचाती थी, लेकिन कुछ ही दिन में उसने हॉकर के तौर पर एक कर्मचारी भी रख लिया, जो सचिवालय और पुलिस मुख्‍यालय के कमरों में बैठे अफसरों तक यह अखबार पहुंचा देता था। कुछ दो सौ प्रतियां छपती थीं इस अखबार की। चार पन्‍ने का यह अखबार बिबिया फ्री में ही हर अफसर तक पहुंचाती थी। एक कैमरामैन लेकर वह जहां-तहां घूमा करती थी, और अफसरों-नेताओं की ऊल-जुलूल बातों को इंटरव्‍यू के तौर पर फोटो के साथ छापा करती थी। नतीजा यह हुआ कि बड़े-बड़े नेता और अफसर उसकी सेवाओं से प्रसन्‍न होकर कभी उसे नकद, तो कभी विज्ञापन के तौर पर भी भारी-भरकम माल थमा दिया करते थे।

बिबिया जब तक जिन्‍दा रही, सूचना-पट्ट ने उसकी जिन्‍दगी आसान कर दी।

( क्रमश: । बाकी अगले अंक में )

मेरी बिटिया डॉट कॉम की नजर में यह मामला खासा संवेदनशील और अराजकतापूर्ण पत्रकारिता से जुड़ा हुआ है। हम इससे जुड़ी खबरें लगातार आप तक पहुंचाते रहेंगे।

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