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दोनों ही मां मजबूर। एक क्रूरता से, दूसरी ममता से सराबोर

: सीतापुर के एक कस्‍बे में मिली ईंट-गुम्‍मों के ढेर में दबी नवजात बच्‍ची : एक और नवजात बच्‍ची देवरिया के जिला अस्‍पताल में बरामद हुई : यूपी में निकल गया "बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" के नारे का दिवाला :  इन बच्चियों को समाज की ममता ने अंगीकार कर लिया :

मेरीबिटिया संवाददाता

लखनऊ : यूपी में अभागी मांओं की दास्‍तानें अब दिल दहलाने लगी हैं, जो अपने कलेजे के टुकड़ों को अपनी पलकों पर पालने वाली अपनी ख्‍वाहिशों को अब कूड़ादान या सड़क के किनारे ईंट-गुम्‍मों के ढेर में दबाने पर मजबूर होती जा रही हैं। अभी हाल ही देवरिया के जिला महिला अस्‍पताल के शौचालय के गेट पर एक मां अपनी नवजात बच्‍ची को छोड़ कर भाग गयी, जबकि दूसरी मजबूर मां सीतापुर में ईंटों के ढेर में अपनी ममता का गला दबा कर चली गयी है। वह तो गनीमत रही कि इन दोनों ही मामलों में इन नवजात बच्चियों को बचा लिया गया।

यह हालत है यूपी में मजबूर होती ममता की। जिस बच्‍ची को अपनी मां से चिपकना चाहिए, जिस बच्‍ची को अपनी मां और अपने परिवार का चिराग बनना चाहिए, जिसे लोरियां सुनायी जाननी चाहिए, जिसके सपनों को पूरा करने के लिए पूरे समाज को आगे बढ़ कर उसे जी-जान लड़ा देना चाहिए, ऐसी बच्चियां की बरामदगी अब या तो अस्‍पताल के शौचालयों में हो रही है, या फिर वे बेहद दर्दनाक हालातों में सड़क-कूड़े-कचरे में मौत को गले लगाने पर आमादा हैं। लगातार बढ़ती जा रही ऐसी घटनाओं ने आम आदमी की ममता के हृदय-स्‍थलों को पूरी तरह क्रूर और बंजर बना डाला है। और खास तौर पर ममता की प्रतिमूर्ति मानी जाने वाली माएं आजकल क्रूरता पर आमादा दिख रही हैं। लेकिन इसके बावजूद उनकी यह क्रूरता या तो कहीं-कहीं उनकी मजबूरी बनती जा रही है, या फिर उन्‍हें ऐसा क्रूर बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। पिछले 15 दिनों के भीतर कम से कम दो घटनाएं इस तथ्‍य का प्रमाणित कर रही हैं।

लेकिन इसके बावजूद ऐसी बरामद होने वाली बच्चियों और उनकी ममता उनकी मां या उनके परिवारी जनों के हृदयों को पाषाण बना चुकी हो, समाज में ममता ऐसी अभागी नवजात बच्चियों के प्रति ममता लगातार कहीं ज्‍यादा भड़क जाती है। सीतापुर और देवरिया में हुए इन दोनों हादसों में उन बच्चियों को उनकी माओं ने भले ही अपनी ममता का गला घोंट दिया हो, लेकिन उन बच्चियों को समाज की ममता ने अंगीकार कर लिया है।

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देवारण्‍य

सीतापुर के मिश्रिख से हमारे संवाददाता सुरेंद्र कुमार मौर्य ने लिखा है कि:- जहां एक ओर सरकार "बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ"पर लाखों करोड़ों खर्च कर बेटियों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है,जिसकी बानगी समाज में देखने को भी मिलती है,आज बालिकाएँ न केवल हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है,बल्कि कुछ वर्षों से हर क्षेत्र में बालकों से आगे जाकर आँकड़े स्थापित कर रही है,वहीं दूसरी ओर समाज मे एक तबका ऐसा भी है,जो आज भी अपनी सोच बदलने को तैयार नही है,वह लड़कियों को पालन-पोषना तो दूर की बात उसे फूटी आंखों से भी देखना नही चाहता,इसकी बानगी आज उस समय देखने को मिली जब सीतापुर के मिश्रिख कोतवाली अंतर्गत ग्राम अरबगंज में गांव के बाहर एक नवजात बच्ची को आम के बाग में कोई मिट्टी के ढेलों के बीच दबा कर छोड़ गया। इसका पता गांववालों को उस समय चला जब लोगों को उसके रोने की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनकर ग्रामवासियों का ध्यान उस ओर गया,जब लोगों ने नजदीक जाकर देखा तो गांव के बाहर आम के बाग में एक नवजात बच्ची मिट्टी के ढेलों के बीच दबी पड़ी चीख रही है।

इसे देख तमाम लोगों की भीड़ जमा हो गई, मिट्टी को हटा कर बच्ची को निकाला गया। बच्ची के शरीर चोट है, जो सम्भवतः ईंट-मिट्टी में दबने के कारण आई होगी। इसी बीच मौके पर मौजूद इसी गांव के निःसन्तान हरि किशुन लाल पुत्र रामप्रसाद ने इसे गोद लेकर पालन-पोषण करने का निर्णय लिया। मौके पर पहुची पुलिस ने बच्ची के स्वस्थ्य परीक्षण व प्राथमिक उपचार के लिए गोद लेने के इच्छुक दम्पत्ति के साथ अस्पताल भेज दिया है। क्षेत्र की यह घटना लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई है। कुछ भी हो, जिस तरह से यह बच्‍ची बरामद हुई है, उसको यहां फेंकने का मकसद उस बच्‍ची को मार डालना ही रहा होगा। उसे फेंकने का उद्देश्‍य यह रहा होगा कि या तो वह बच्‍ची ईंट-मिट्टी में दब कर मर जाएगी, या फिर उसे कुत्‍ते या जंगली जानवर का निवाला बन जाएगी। लेकिन इसके बावजूद इस कुकर्म में उसकी मां की रजामंदी तो हर्गिज नहीं रही होगी।

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सीतापुर

उधर देवरिया में हमारे संवाददाता गौरव कुशवाहा ने खबर दी है कि यहां के महिला जिला अस्‍पताल में एक नवजात बच्‍ची बरामद हुई। यह बच्‍ची इस अस्‍पताल के एक वार्ड में बने शौचालय के गेट पर सुबकती हुई मिली। साफ लग रहा था कि इस बच्‍ची को छोड़ कर उसकी मां भाग गयी होगी। पुलिस इस मामले की जांच कर रही है कि आखिर किस ममता ने यहां अपनी ममता का गला घोंटने की कोशिश की है। वैसे जिस तरह इस बच्‍ची को यहां जिला अस्‍पताल में छोड़ कर उसकी मां भागी होगी, उसकी मंशा उस बच्‍ची को जान से मारना हर्गिज नहीं रहा होगा। बल्कि वह तो या तो सामाजिक दबावों के चलते अपनी इस नाजायज बच्‍ची को छोड़ कर भागने पर मजबूर हुई होगी, या फिर उसके जन्‍म पर उसके परिवारी जनों ने उसे मजबूर किया होगा कि वह कैसे भी हो, वह अपनी इस बच्‍ची से अपना पिण्‍ड छुडा ले।

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