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थूक कर चाटना तो कोई इन निर्लज्ज चटोरों से सीखे

: देवभूमि पर चंद पत्रकारों ने पुलिस अफसरों के आगे घुटने टेके, गिरगिट भी शर्म से लाल : पत्रकार-वकीलों पर बर्बर लाठीचार्ज से हुई फजीहत से बचने के लिए प्रशासन ने खोजी पत्रकारों में कमजोर कड़ी : कुकुर भोज मानने वाले पत्रकारों के इस रूप को देख पुलिस मन ही मन अट्ठाहस कर रही थी :

राजन मिश्र

देवरिया : थूक कर चाटना निर्लज्जता की कला इसलिए कही जाती है क्यूँकि कोई भी स्वाभिमानी इंसान  किसी भी सूरत में इस कुकृत्य को पसंद नहीं करता। स्वाभिमान यदि एक बार भी गिरवी हुआ तो मूर्तरूप में उसे दोबारा हासिल करना कदापि संभव नहीं। बात जब बुद्धिजीवी कहे जाने वाले पत्रकारों की हो तो मैं नहीं. समझता ऐसी ओछी हरकत की उनसे उम्मीद कोई करेगा। अफसोस इस तरह के ही  निर्लज्जता के दर्शन देवभूमि को करना पडा। देवभूमि पर पत्रकारों की एक खास टोली पुलिस के आला अफसरों के आगे ऐसे घुटने टेके, जिसे देख गिरगिट भी शर्म से लाल हो जाए। ऐसे में सवाल लाजमी है कि रंग बदलने की कला वह भी पांच दिन के भीतर नारद के कथित वंशजों ने सीखा कहां से? इस सवाल का उत्तर जानना हो तो नजरें दौडाते रहें। हम खोल रहें हैं उन उन्मादी  मेंढक की कलई जिन्हें एक तराजू पर तौलने का असफल प्रयास हुआ।

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देवारण्‍य

एक दिसंबर, निकाय चुनाव की मतगणना के दिन भाजपाइयों पर पिल पडी पुलिस ने जब पत्रकार दीर्घा पर धावा बोला तो उन लोगों की सांस अटक गई जिन्हें खुद के  शेखचिल्ली होने का गुमान था। सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि अधिकारियों को भी पुलिस द्वारा पीटे जाने की घटना ने फौरी तौर पर उन पत्रकारों के घाव पर मरहम का काम किया जिन्हें खुद के विशिष्ट होने का गुमान था। बहरहाल पत्रकारों के सब्र का पैमाना तब छलका जब उन्होंने अपने ही एक वरिष्ठ साथी को लहूलुहान देखा। लाठीचार्ज की अप्रत्याशित घटना पर भाजपाइयों और प्रशासनिक अफसरों की रहस्यमयी खामोशी से संपात चुके पत्रकारों को कुछ देर बाद लगा कि पुलिस ने उनके साथ ज्यादती की है। इसके बाद किसी सियार की भांति हुआँ करने का दौर शुरू हुआ।

दो दिन तक पत्रकारों की आवाज़ नक्कारखाने में तूती बनी रही। सरकार के दबाव पर जब पुलिस के आला अफसरों की नींद टूटी तब अकारण लाठीचार्ज की  आरोपी पुलिस के खिलाफ कार्रवाई हुई। यहां तक पत्रकारों की आवाज एक रही। परिणाम हुआ कि स्थानीय प्रशासन दबाव में आ गया। उच्चाधिकारियों को इस बात का अहसास हो गया कि पत्रकारों के रुख को यदि जल्द मोडा नहीं गया तो उपजा तूफान उन्हें अपनी आगोश में ले लेगा। इसका एक प्रबल कारण भाजपाइयों और पत्रकारों के साथ ही अधिवक्ताओं का भी स्थानीय प्रशासन के खिलाफ बागी होना था। अनिष्ट से बचने का असल खेल यहीं से शुरू हुआ।

देवरिया में पत्रकारों पर बर्बर लाठीचार्ज कराने वाली पुलिस के वर्तमान पुलिस अधीक्षक राकेश शंकर से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

राकेश शंकर

आला अफसर कमजोर कडी की तलाश में जुटे। बलि के लिये पत्रकारों से बेहतर मुर्गा उन्हें कोई और नहीं दिखा। मुर्गों पर जाल डालने की नियत से पहले चारा फेंका गया। पीसी की आड में पत्रकारों को दावत ( रात्रि भोज) दी गई। पुलिस का प्रस्ताव पाते ही पत्रकार यह भांप गए कि उन पर डोरे डाला जा रहा है। फिर भी फितरतन उनके मन में यह डर समा गया कि दाने की लालच में उनके बीच का कोई मुर्गा पुलिस के हाथ न लगे। नहीं तो दबाव के इस खेल का बंटाधार समय से पहले ही हो जाएगा। इस भय का ही परिणाम रहा कि सोशल मीडिया पर पुलिस की दावत में शामिल न होने की कसमें खाई गईं। संकल्प और प्रतिबद्धता का ऐसा विहंगम दौर चला कि कुछ लोग मर्यादा की चौकठ पार कर गए। फिर भी संतोष यह रहा कि सारे सियार एक सुर में हुंआ बोल रहे थे। परिणाम हुआ कि पत्रकारों पर डोरे डालने की पहली पुलिसिया कोशिश विफल रही।

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पत्रकार पत्रकारिता

हाथ लगी इस विफलता के बाद भी पुलिस घबराई नहीं। अंग्रेजों की परंपरा को आज तक ढोने वाली पुलिस भली भांति यह जान गई थी कि देर है अंधेर नहीं। कुछ ही वक्त में पत्रकार टूटेंगे। लजीज और अकल्पनीय व्यंजन की महक उनके नाक तक गई है। खा भले ही नहीं पाए पर मलाल जरूर प्रदर्शित करेंगे। पुलिस की बांछें आखिरकार पांचवें दिन ही खिल गईं। पत्रकारों के बीच की एक टोली से कुछ लोग पुलिस की चौकठ पर नाक रगड़ने पहुचे थे। पहले लाठी फिर भोज से स्वागत को कुकुर भोज मानने वाले पत्रकारों के इस रूप को देख पुलिस मन ही मन अट्ठाहस कर रही थी। पत्रकारों को अपनी चौकठ पर देख पुलिस के कान में विजय गीत की प्रतिध्वनि सुनाई देने लगी। हद यह है कि पत्रकारों ने पुलिस के प्रीति भोज में शामिल न हो पाने की अपनी व्यथा का कारण तक गिना डाला।  यह बताया गया कि सोशल मीडिया पर भोज में शामिल न होने की अशोभनीय हिदायत उनकी राह का रोडा बन गई। नहीं तो उनके पांव लजीज व्यंजन तक जरूर पहुंचे होते।

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बड़ा दारोगा

हास्यास्पद यह दलील कारगर नहीं लगी तो बंदिश की रेखा खींचने वालों को फर्जी करार देते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई। भरत मिलाप के इस विहंगम नजारे ने उस हर व्यक्ति को हताश किया जिन्होंने बेरहमी के साथ पत्रकारों को लाठी और मां बहन की गालियां खाते सरेआम देखा है। सोशल मीडिया तक बेजार हो चुके पत्रकारों की इस टोली की तुलना गिरगिट से भी करना मुनासिब नहीं। क्यूंकि यह छोटा जीव रंग बदलने में कुछ वक्त लेता है। अब सवाल यह है कि फर्जी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की गाहेबगाहे मांग करने वाले असल पत्रकारों के सब्र का बांध आखिरकार तब क्यूं टूटा जब उन्होंने खुले तौर पर पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था? शिकायत उस पुलिस से क्यूं की गई जिसके पास पत्रकारिता का लाइसेंस देने का अधिकार ही नहीं है? कहते हैं, बात वक्त की है और जिसे वक्त का ख्याल नहीं वह सिर्फ और सिर्फ पशु है, हालांकि पशु भी वक्त पर ही पुकार लगाते हैं।

एक पत्रकार होने के नाते मन का मलाल लिख रहा हूँ। किसी को बुरा लगे तो माफ करे।

( स्‍थानीय पत्रकार राजन मिश्रा की कलम से उनकी व्यथा, जो उन्‍होंने प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम को भेजी )

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