Meri Bitiya

Thursday, Apr 22nd

Last update02:57:01 PM GMT

मेरी बिटिया डॉट कॉम अगर आपको पसंद हो, आप इस पोर्टल के लिए सुझाव, समाचार, निर्देश, शिकायत वगैरह भेजने के इच्‍छुक हों तो meribitiyakhabar@gmail.com पर हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे है.

Advertisement

ठाकुर साहब पों-पों: सरकार में इत्‍ती बार शामिल हुए कि कलछुल भी शर्मिंदा

: एक की बेमिसाल छीछालेदर हो गयी, दूसरे को क्षत्रिय लोग ठाकुर मानते ही नहीं : अखिलेश का फण्‍डा तो अण्‍डा के फण्‍डे से भी अलहदा निकला, धरचुक्‍क दिया : अपने राग-रंग-सांग और नचनिया भाव से नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर दिया : ठाकुर साहब पों-पों- तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तो किस्‍सा कोताह सिर्फ यह कि समाजवादी पार्टी में शेर-सिंहों की जमात में केवल दो ही ठाकुर साहब जैसी दो शख्सियतें नमूना के तौर पर नमूदार हुआ करते थी। दोनों को ही मुलायम सिंह यादव ने तो सिर-माथे पर टिकाया। एक को पुत्रवत, तो दूसरे को भातृवत प्‍यार किया। दरअसल मुलायम का सपना था कि यह दोनों ठाकुर ठीक उसी तरह उनकी बैसाखी बन पायें, जैसे अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव। मकसद यह कि उनकी सल्‍तनत बनी रहे, सर्व-जाति-सर्वभाव बना रहे, समावेश-प्रवृत्ति का रस टपकता रहे। इससे छवि बेहतर बनी रहती है, यह मुलायम का फण्‍डा था।

लेकिन अखिलेश का फण्‍डा तो अण्‍डा के फण्‍डे से भी अलहदा रहा। मुलायम ने जो भी डगर बनायी, अखिलेश उसे उसे खोद डाला। आप ठाकुरों पर ही बात कर लीजिए, तो साफ दिख जाएगा कि अखिलेश यादव ने इन दोनों ही ठाकुरों को जी-भर कर वह-वह किया, जो-जो हो सकता था। फिल्‍मी गीत भी इस पर बेहद माकूल और फिट हो सकता है कि:- दुश्‍मन न करे दोस्‍त ने वो काम किया है, जिन्‍दगी भर गम हमें ईनाम दिया है।( पूरा गाना यू-ट्यूब पर उपस्थित है, जिसे भी सुनना हो, झूम सकता है)। जिनमें से एक को तो ठाकुर लोग ठाकुर मानते ही नहीं थे। और दूसरे ठाकुर साहब तो सपा सरकार में इतनी बार भीतर-अंदर गये, जितना कड़ाही में कलछुल।

यहां हम उन दोनों ठाकुर नेताओं की बात कर रहे हैं, जो कभी समाजवादी पार्टी में खासे ताकतवर थे। लेकिन बेटे द्वारा पिता के विरूद्ध हुए कू, यानी सत्‍ता-अपदस्‍तीकरण में दोनों ही न जाने कहां बिलाय गये। सबसे पहले तो अमरत्‍व-पान किये शेर-ओ-शायरी वाले बड़बोले नौटंकी-नेता को अक्‍लेस ने जमकर कर छियो-राम छियो-राम करते हुए धोया-पछोरा, फिर उसे मरे चूहे की तरह आंगन के पार पूंछ पर चकरघिन्‍नी बना कर सरसरउव्‍वा फेंक दिया। जयप्रदा की भी सद्गति उनके साथ ही निपट गयी। साथ में चले गये चिंटू-पिंटू यानी शिवपाल सिंह और मुख्‍यसचिव बनाये गये सिंघल। लेकिन हैरत की बात है कि अमर सिंह के साथ लटक बने ठाकुर नेताओं ने भी मौका देखते ही अमर सिंह से किनारा कर लिया। अरविंद सिंह गोप जैसे लोगों का नाम इसी लिस्‍ट में है, जिन्‍हें अमर सिंह ने पीठ पर खंजर मारने वाले के तौर पर छिपे शब्‍दों में सम्‍बोधित किया था। बहरहाल, अब यही गोप-नुमा लोग ही अमर सिंह को खारिज करते हैं, और गाहे-ब-गाहे यह तक कमेंट पास कर देते हैं कि अमर सिंह तो क्षत्रिय-जाति पर कलंक थे जिन्‍होंने क्षत्रियत्‍व को अपने राग-रंग-सांग और नचनिया भाव से नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर दिया। आक्‍क थू।

दूसरे ठाकुर नेता हैं राजा भइया प्रतापगढ़ी। अक्‍लेस ने राजा भइया को बाकायदा कलछुल बना डाला, जिसे बार-बार कड़ाही में घुसेड़ा-निकाला जाता है। इसी तर्ज पर अखिलेश ने जब चाहा, सरकार में रखा, और जब मूड में आया तो निकाल बाहर कर दिय। याद कीजिए वह वक्‍त, जब अपनी सरकार में राजा भइया को लेकर खूब हंगामा हुआ था। जहां-तहां नहीं घूमते-भागते रहे हैं राजा भइया कि सरकार अन्‍नदाता, हमको भी सरकार में रख लो। और सबसे बड़ी घटना तक हुई जब अखिलेश ने प्रतापगढ़ में डीएसपी रहे जिया उल हक की हत्‍या का दोष राजा भइया के माथे पर चस्‍पा किया, और उनका सरकार से घसीट कर बाहर कर दिया। यह जानते हुए भी कि इस मामले में राजा भइया का तनिक भी दोष नहीं है, अखिलेश ने राजा भइया को औकात में खड़ा कर दिया था।

लेकिन गजब है, राजा भइया की अकड़। दोबारा भी जब उन्‍हें राजभवन में बुलाया गया कि आओ बेटा, मंत्री बनने के लिए लपक जाओ। तो वाकई राजा भइया ने अपनी रीढ़ का तान लिया, और बढ़ गये शपथ-ग्रहण करने।

प्रतापगढ़ के ही एक ठाकुर ने बेहद हिकारत और घृणा के साथ इस घटना पर प्रतिक्रिया दी:- छि। अरे ठाकुर हो, तो ठाकुर की तरह तो व्‍यवहार करो। इस तरह तो क्षत्रियों की पूरी नाक कटवा दिया इस आदमी ने। कुर्सी के लिए किसी घटिया कलछुल की तरह बटलोई में अंदर-बाहर हो जाता है आदमी। (क्रमश:)

यह सिर्फ एक कहानी भर ही नहीं, बल्कि हमारे समाज के सर्वाधिक प्रभावशाली समुदाय की असलियत भी है, जिसका नाम है क्षत्रिय। वंस अपॉन अ टाइम, जब देश को क्षत्र देने का जिम्‍मा इन्‍हीं ठाकुरों पर था। इस लेख या कहानी-श्रंखला में हम आपको इस समुदाय की वर्तमान परिस्थितियों का रेखांकन पेश करने की कोशिश करेंगे। दरअसल, बाबू-साहब समाज में आये बदलावों पर यह श्रंखलाबद्ध कहानी को उकेरने की कोशिश की है प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने। आप में से जो भी व्‍यक्ति इस कहानी को तार्किक मोड़ दे कर उसे विस्‍तार देना चाहें, तो हम आपका स्‍वागत करेंगे। आइये, जुड़ जाइये हमारी इस लेख-श्रंखला के सहयोगी लेखक के सहयोगी के तौर पर।

इसकी बाकी कडि़यों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

ठाकुर साहब पों-पों

Comments (1)Add Comment
...
written by Vivek singh , December 20, 2017
सही कहा सौविर जी तभी तो अखिलेश जी आज इस हालत में है ओर आगे क्या होगा भगवान ही जाने ओर रही बात वो दो ठाकुरों की तो आप भी जानते है की आज भी उनका क़द बहुत बड़ा है ओर उन दो ठाकुरों को कोई भी सिर आँखो पर बिठाने को तैयार है

Write comment

busy