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वैचारिक बेईमानी: डीजीपी को बेटन थमा गए सुलखान

: उस दौर में जब पुलिस का दायित्व लोकसेवा होता है, पुलिस को डंडा देने का क्या अर्थ था : अपने रिटायरमेंट के अंतिम दिन अपने वंशजों को लाठी थमा कर क्‍या संदेश देना चाहते हैं सुलखान सिंह : बेटन का अर्थ केवल हमला ही होता है, यानी आक्रमण। आप क्‍या चाहते हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बेईमानी दरअसल एक बहु-आयामों वाला शब्‍द है। इसमें ढेर सारे अर्थ-अनर्थ सन्निहित होते हैं। इन आयामों में सबसे निकृष्ट बेईमानी होती है चारित्रिक। और उसके बाद आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक वगैरह-वगैरह। इसी क्रम में एक बड़ी बेईमानी होती है, जिसे वैचारिक बेईमानी कहा जाता है। हालांकि बेईमानियों की मूल जननी होती है वैचारिक बेईमानी, लेकिन ताजा हालातों में अब इसे बहुत हल्का माना जाने लगा है। घर में नन्‍हें-मुन्‍ने जब कालांतर में बड़े होकर जब बलशाली हो जाते हैं, तब मां यानी जननी को कौन पूछता है, ठीक इसी शैली में दीगर बेईमानियों में सबसे कमजोर जननी, यानी निर्बल की जोरू की हालत हो चुकी है वैचारिक बेईमानी की। बावजूद इसके कि वैचारिक स्तर पर ही सारी बीमारियों की गंगोत्री निकलती है।

बहरहाल, सुलखान सिंह पर कभी कोई भी आर्थिक, चारित्रिक आरोप नहीं लगा है, लेकिन अपनी वैचारिक बेईमानी को लेकर सुलखान सिंह अपनी नौकरी के आखिरी क्षणों में बेहद चर्चा में आ चुके हैं। उनकी वैचारिक बेईमानी की ताजा आखरी नजीर साबित हुआ है एक डण्‍डा, जिसका नाम है बेटन। सुल्तान सिंह ने एक नई परंपरा के तौर पर बेटन के बारे में सोचा, आकार दिया, गढ़ा और अंतत: अपने रिटायरमेंट के आखिरी दिन उसे लागू भी कर लिया। उन्होंने एक डंडे को बेटन का नाम दिया, और अपने वंशजों को थमा दे दिया, कि जा बेटा। अब मौज कर। डंडा अब तेरे हाथ में है। जो चाहे कर ले, तेरा अब कोई नहीं उखाड़ पायेगा।

हैरत की बात है कि यह काम वह उस शख्‍स ने किया, जिसे पुलिस महकमे के अपनी सबसे मजबूत कुर्सी दी थी।

सुलखान सिंह ने भले ही अपने इस आखिरी सेवाकाल में इस बेटन को अपने सेवाकाल को भविष्‍य में अपनी याद बनाये रखने, और अपनी यादगार के तौर पर उसे पुलिस की कार्यशैली में शामिल किये जाने की मंशा के तहत किया हो, लेकिन वह यह साबित नहीं कर पाए कि आखिरकार वे अपने वंशजों को इस बेटन सौंपने के तहत क्या संदेश देना चाहते थे। क्‍यों सुलखान ने अपने विशालकाय पुलिस महकमे को थमाने की कोशिश के तहत यह बेटन आने वाले डीजीपी को सौंपी और उसे परम्‍परा में शामिल कर लिया। अगर सुलखान इस बेटन के तहत यह डंडा एक प्रतीक-अस्‍त्र के तौर पर लोक-प्रशासन, विभागीय अनुशासन और अपने विभाग की छवि को और तराशने की कोशिश करना चाहते थे, तो आई ऐम सॉरी टू से मिस्‍टर सुलखान सिंह, इस मामले में भी आप पूरी तरह असफल रहे हैं।

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आखिर बेटन है क्‍या? इसकी जरूरत क्या है? इसका अर्थ क्या है? इसकी उपयोगिता क्या है? इसकी उपादेयता क्या है? उसकी क्रियाशीलता क्या है? क्या यह बेटन आम आदमी के साथ ठीक उसी तरह डील करने की कोशिश है जिस तरह ढोर-डांगर चलाएं-चराये जाते हैं? यह या ऐसे ही तमाम सवाल किसी भी सहज बुद्धि वाले व्यक्ति को मथ सकता है। लेकिन इसके पहले हमें इस बेटन के वास्‍तविक अर्थ को समझना पड़ेगा।

बेटन एक अस्त्र है। आप उसे शब्दकोश यानी डिक्शनरी में खोजना चाहेंगे तो इसके दो उपयोग दिखाई पड़ते हैं। पहला तो कानूनी अर्थ है जिसका प्रयोग शब्द है सेल्फ डिफेंस। और दूसरा है सामाजिक अर्थ है जिसका अर्थ है आक्रमण। दर्शन और उपयोग के स्‍तर पर दोनों ही शब्‍द-संयोजन एक ही दिशा के अलग-अलग गर्म-हवा वाली तरंगों-लहरों के अर्थ हैं। आप कह सकते हैं कि यह दोनों ही क्रियाशील समानार्थी शब्‍द हैं। पर्यायवाची के स्तर तक सगोत्रीय शब्द। यह दोनों दोनों का ही अर्थ सुरक्षा होता है और आक्रमण के ही आसपास।

ऐसे वक्त में जब पुलिस के पास अपराधियों से निपटने के लिए अत्याधुनिक सुख-साधन और उपकरण मौजूद हैं, बेटन की जरुरत क्या थी। उसकी उत्पत्ति के लिए सुलखान सिंह को क्‍यों मथ रही थी। क्यों उसकी जरूरत पड़ी। क्यों एक पुलिस वाले विशाल संगठन के मुखिया को एक डंडे की आवश्यकता पड़ी।

समझने की कोशिश कीजिए जनाब। अर्थ समझ में आ जाएगा। सच बात तो यह है कि सुलखान सिंह ने यह फैसला बहुत सोच-समझकर नहीं लिया होगा। दरअसल पुलिस का यह मुखिया अपने वंशजों और अनुयाइयों को यह समझाना चाहते होगे कि जनता के हाथ-पांव को लाठियों से तोड़-कूट कर अमझोरा बना दो। जनता का जूस निकाल दो, उसे भय से इतना अपंग कर डालो, ताकि उसके पास सोचने-करने की हिम्‍मत नहीं पड़े। इससे फायदा यह भी होगा कि यह हमला किस तरफ से चला, पता नहीं चलेगा और कानूनी शिकंजे बहुत ढीले हो जाएंगे। वगैरह-वगैरह।

जिन्‍दगी भर एक ढर्रे की पुलिसगिरी करने वाला शख्‍स इससे अलग कुछ सोच भी तो नहीं सकता था। (क्रमश:)

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