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मूर्तियों से पूछो न कि कुमार सौवीर क्‍यों हारा ?

: जिन्‍दा समाज हारे हुए शख्‍स को हमेशा याद करता है, अनैतिक रूप से जीतने वाले को नहीं : राणाप्रताप, रानी लक्ष्‍मीबाई, शिवाजी, गुरूगोविंद सिंह जैसे शख्सियतों की प्रतिमाओं को स्‍थापित करने का मकसद समाज को नैतिक बनाना होता है : जीत गया कुमार सौवीर -दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कभी दिल्ली से गुड़गांव जाइये। रास्ते में आपको कई अजीबोगरीब अनुभव होंगे। गजब की रफ्तार, कार-वाहनों की भारी रेलमपेल, और देश के हिस्‍से में पसरी विलासिता-ऐश्वर्य प्रमाणित करती लकदक दुनिया। साफ लगेगा कि भारत का यह हिस्सा विजयी हो चुके लोगों की जागीर है। इसी रास्ते में ही आपको मिलेंगी इतिहास पुरुष बन चुके लोगों की विशालकाय प्रतिमाएं। ऐसी सजीव प्रतिमाएं, मानो जैसे आप आधुनिक काल में नहीं, बल्कि भारत के गुप्‍त-वंश काल में बनायी गयी हों।

बस अब इन चीजों को बेहतर तरीके से सोचने और खोजने की कोशिश कीजिएगा। हल्‍की सी कोशिश में ही आप को सब पता चल जाएगा कि यह जो कुछ भी हो रहा है या दिख रहा है वह असलियत में क्या है। इन चीजों के बीच जो लहलहाती सब्‍जबागों की फसल आपको दिखेगी, दरअसल वही तो वह खाई है। तब आपको दिखाई पड़ेगी, इस उल्लास में छिपी भारत के अतीत की असलियत।

तो सबसे पहले तो देखिए महाराणा प्रताप जी की कद्दावर प्रतिमा। फिर आप देखेंगे उस महिला की विशालकाय प्रतिमा, जिसने अपने दत्तक पुत्र छत्रसाल को अपने पीठ में बांध कर नंगी तलवार लहराई और झांसी के किले से करीब डेढ़ सौ फीट के नीचे अपने घोड़े के साथ कूद गई। जी हां, झांसी की मर्दानी रानी लक्ष्‍मीबाई। इसके बाद दिखाई पड़ेंगे शिवाजी जिन्होंने अपने मराठा साम्राज्य को जीतने के लिए अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। वहीं पर दिखाई पड़ेगी आपको गुरु गोविंद की प्रतिमा जिन्होंने अपने धर्म स्थापना के लिए उसूल, नैतिकता,आदर्श को सुरक्षित करने के लिए अपने परिवार ही नहीं बल्कि अपने जीवन का भी अंत कर दिया था। और फिर यूपी और दिल्‍ली-गुड़गांव ही क्‍यों, ऐसी प्रतिमाएं तो हर शहर तक में दिख जाएंगी।

कहने की जरूरत नहीं कि चाहे वह महाराणा प्रताप रहे हो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, वे मराठा शिवाजी रहे हो या फिर सिक्खों के गुरु गोविंद जी, इतिहास गवाह है इन सभी ने हर बार अपनी हार का स्वाद चखा है। मगर अपने नैतिकता, ईमानदारी, आस्था, विश्‍वास और आदर्शों पर तनिक भी ठेस न लगायी। प्राण दे दिया मगर अपने आदर्श नहीं छोड़े और वह भले ही अपने जीवन को खत्म कर चुके हों, हमेशा हारते ही रहे हों, लेकिन सच बात यही है कि उनके हर आदर्श, हर नैतिकता और हर उसूल हमेशा जीतते ही रहे हैं। अब यह दीगर बात है कि उनके बाद की संतानों ने उनकी हार से उपजे जीत अपने गले में लटकाये हैं।

जी हां, वे लोग भले ही बार-बार हारते रहे, लेकिन केवल इसलिए ताकि उनकी हार लोगों के लिए एक सबक बन जाए। उनके लिए सफलता की एक नई दिशा-मुकाम बन जाए। उनका जीवन लगातार और उत्तरोत्‍तर विकसित होता जाए। इंसानियत हिसाब से और भी मजबूती के साथ बढ़ती जाए। वह भले ही मर जाएं लेकिन उनकी औलादें हमेशा के लिए खुश रहें, सुरक्षित रहें और खुद को विजयी जाति के तौर पर गर्व महसूस कर सकें। इन मूर्तियों को स्‍थापित करना किसी भी समाज की सर्वोच्‍च प्राथमिकता होती है। क्‍योंकि समाज खूब जानता है कि आदर्शों की लहरें ही समाज को जिन्‍दा रख सकती हैं। इसीलिए कोई भी समाज हारे हुए शख्‍स को हमेशा याद करता है। आप पायेंगे कि अपने आदर्शों-मूल्‍यों के बल पर युद्ध करने वाला व्‍यक्ति महापुरूषों-योद्धा होता है, जबकि उसे हराने वाला कायर। इसलिए समाज और इतिहास हमेशा जीते को याद नहीं कर पाता है, मगर हारे हुए नैतिक शख्‍स को खूब याद रखता है।

अब इस सारी चर्चाओं का मकसद भी है जिसे मैंने उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के हाल ही हुए चुनाव के नतीजों से महसूस किया और जोड़ा भी है। मैंने इस चुनाव-युद्ध में अपने आदर्श, नैतिकता, और सारे आदर्शो- उसूलों के साथ बिगुल बजाया था। मैंने तय किया था कि अपने बीते जीवन की ही तरह इस चुनाव में भी खुद को बिल्कुल साफ-सुथरा ही बनाए रखूंगा। एक भी धब्बा अपने दामन में ना रखूंगा, चाहे कुछ हो जाए। मैंने साफ कह दिया था कि मैं अपने आदर्शों से कतई नहीं डिग सकूंगा। भले ही हार का स्वाद चखना पड़े। और मुझे गर्व है यह मेरे आदर्श और संकल्‍प जबर्दस्‍त ढंग से जीत गए, और क्‍या हुआ जो मेरे मुंह मतदान परिणाम की हार के कसैले स्‍वाद से कड़वा हो गया।

मुझे गर्व है कि मैं जीत गया। चुनावी दंगल में नहीं, बल्कि सिद्धांतों और आदर्शों की रणभूमि में। आप क्या समझते हैं मुझे मिले करीब ढ़ाई दर्जन पत्रकारों ने मुझे सेंत-मेंत में ही यह वोट दे दिया होगा?  सत्‍ता के गलियारों में खबरों को लेकर दलाली और चापलूसी कर अपनी अस्मिता तक को बेचने पर आमादा पत्रकार-नुमा लोगों की भीड़ में अगर ढाई दर्जन से भी ज्यादा मेरे साथ कदमताल करते रहे, तो क्‍या यह मजाक था? हर्गिज नहीं। मेरे साथ जो भी पत्रकार सामने आए, उन्होंने मुझे मेरे चरित्र और संघर्ष का समर्थन किया है। किसी पार्टी, दारूबाजी, उपहार, तोहफों पर नहीं बिके यह ढाई दर्जन पत्रकार। मुझे बिना शर्त समर्थन दिया इन पत्रकारों ने।

इतने लोगों ने मेरे आदर्श, नैतिकता और सारे उसूलों के साथ मेरे पक्ष में बिगुल बजाया। यह जानते हुए भी इन लोगों ने मुझे समर्थन दिया, कि कुमार सौवीर किसी भी खबर पर कोई समझौता नहीं करते हैं, और न ही कभी ऐसा करेंगे। फिर तो इतने पत्रकारों ने यह खतरा क्‍यों उठाया ? इसका जवाब मुझसे या उन पत्रकारों से मत पूछिये जिन्‍होंने मुझे सारे खतरे उठा कर भी मुझे वोट दिया। आपको पूछना ही हो, तो सीधे उन विशालकाय मूर्तियों से पूछियेगा कि आखिर उन्‍होंने अपने आदर्शों और मूल्‍यों के लिए क्‍यों अपनी जिन्‍दगी को भस्‍म किया। यह मर्म दलाल पत्रकार नहीं समझ पायेंगे, लेकिन हमारे साथ खड़े पत्रकार और वह मूक-मूर्तियां साफ-साफ बोल पड़ेंगी।

आप सिर्फ कोशिश तो कीजिए उनसे पूछने की।  (क्रमश:)

यह तो है उन महान लोगों की कहानी, जो भले ही चुनावी दंगल में हार गये, लेकिन उनके आदर्श आज भी लोगों के दिल-दिमाग में ताजा हैं, नजीर बने हुए हैं। ऐसी हालत में कुमार सौवीर की हैसियत क्‍या है, आखिर किस खेत की मूली हैं कुमार सौवीर, यह सवाल सहज ही अपना सिर उठा लेता है। उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव में मैं हार गया। मगर मैं इस पराजय को अपनी एक बड़ी जीत के तौर पर देखता और मानता हूं। मेरी इस मान्‍यता और अडिग आस्‍था-विश्‍वास को लेकर मेरे खुद तर्क हैं, और इतिहास में बेहिसाब नजीरें भरी पड़ी हैं। अगले कुछ अंकों में मैं अपनी इस हार नुमा बेमिसाल विजयश्री का सेहरा आप सब को दिखा रहा हूं, और उसकी व्‍याख्‍या भी कर रहा हूं। मेरी उस श्रंखलाबद्ध लेख को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नैतिक रीढ़ का नाम है कुमार सौवीर

Comments (3)Add Comment
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written by मनजीत सिंह श्री गंगानगर (राजस्थान), May 11, 2018
मेरे भारत देश मे आज लोकतंत्र के नाम पर जो कुछ नेताओं या यूं कहें आर्थिक माफियाओं द्वारा अपने निजी स्वार्थवश घिनोनी हरकते की जा रही है।उन का मुकाबला मीडिया जगत को कर देश वासियों को जागरूक कर राहत दिलानी चाहिये थी किन्तु आज का मीडिया भी इन आर्थिक माफियाओं के यहां अपनी कलम गिरवी रखकर आम लोगो को भृमित कर इन आर्थिक माफियाओं के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया इस दौर में जरूरत है कुमार सौवीर आप जैसे निर्भीक एंव निडर पत्रकारों की जो इन लोगो का मुकाबला आप अपनी ईमानदार,सजग और अपने उसूलों पर चलकर पत्रकारिता करते हुये सही पत्रकार होने का अहसास दुनिया को करवा रहे हो।

कुमार सौवीर जी मेरे पास आपके सम्मान में लिखने को शब्द कोष में ऐसे शब्द नही कि मै कुछ कह सकूं।
मै आपको और आपकी कलम की सच्चाई को सर झुकाकर सलाम करता हूं।
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written by संजय आजाद, May 01, 2018
भईया बेमिसाल और बेबाक लेखनी के लिए हम आपका क्रांतिकारी अभिवादन करते हैं !
हमारी नजर में आप कभी हार नहीं सकते ....
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written by Alok Pandey, April 28, 2018
सौवीर भाई , आप के जैसा कोई दूसरा नही । आप जीत नही पाए , पर आप ने अपने मन ,और संतुष्टि के लिए जो भी किया सराहनीय है , दोस्त जीत इस बात की विकल्प देने की हिम्मत उन सब ने किया जो बदलाव चाहते थे। जीत उन सब की हुई जिन्होंने अपने मन से पूछा और कर्म से किया और सबकी अन्तरात्मा पर छोड़ा । अब फैसला तो उन्हें करना है जिन्होंने अपनी वफादारी मन से , कर्म से या फिर अन्तरात्मा से नही निभाई ।

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