अफसरों की भर्ती: मगर जिम्‍मेदारी कौन लेगा

: सिविल सेवाओं में लेटरल प्रवेश की वकालत तो सन-05 में की थी प्रशासनिक आयोग ने, 13 बरस लग गये सोचने में : सीधे और चयनित नौकरशाहों में होगा झोंटा-नुचव्‍वर : लोक प्रशासन के बजाय यह लोग कारपोरेट हितों पर ही ज्‍यादा जोर देंगे :

अविनाश पांडेय

इलाहाबाद : नौकरशाही के शीर्ष  क्षेत्र मे पार्श्व प्रवेश को संस्थागत बनाने का मोदी सरकार का निर्णय देश के सभी क्षेत्रों में नौकरशाही की गड़बड़ी  और लालफीताशाही को रोकने तथा भारतीय नौकरशाही में कुशलता  को बढाने के लिए है। वर्ष 2005 दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने  सिविल सेवाओं में लेटरल प्रवेश  ( पार्श्व प्रवेश )  की अनुशंसा की थी। लेकिन तब इस प्रस्ताव का भारी विरोध मुख्य रूप से आई ए एस अधिकारीयों द्वारा किया गया था।

यह निर्णय मुख्य रूप से नौकरशाही को कार्पोरेट हितों के अनुरूप बनाने के लिए है। जिससे  आगे चलकर  आम जनता का हित नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकता है और कल्याणकारी  राज्य की अवधारणा को क्षति पहुंच सकती है। पार्श्व प्रवेश के द्वारा  आये नौकरशाह और यूपीएससी के द्वारा चयनित  नौकरशाहों के बीच  आपसी टकराहट बढेगी जो समस्त कार्यपालिका की कार्यप्रणाली को नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर शक्तियों के पृथक्कीरण के सिद्धांत को नुकसान पहुंचा सकती है। अतीत का अनुभव  और अन्य देशों के  उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि इससे निजीकरण का गति में और तीव्रता  आएगी।

इस तरह का कदम कम योग्यता वाले लेकिन राजनीतिक रूप से जुड़े व्यक्तियों के लिए पिछला दरवाजा खोलकर उच्चतम स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करेगा। सिविल सेवक,जिन्होंने बहुत ही प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के माध्यम से सिस्टम में प्रवेश किया है, हतोत्साहित होंगे क्योंकि इन संयुक्त सचिव (जेएस) स्तरों पर उनकी पदोन्नति संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।सरकार कुछ चयनित कंपनियों और निगमों के सीईओ का पक्ष ले सकती है और  ये लोग  आगे चलकर सार्वजनिक हित में निर्णय लेने की बजाय अपनी कंपनी के हित में निर्णय लेना प्रारंभ कर दे।।

पार्श्व मार्ग से प्रवेश पाये नौकरशाहों  से अनुशासन, जवाबदेही और प्रतिबद्धता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि उनके पास सदैव एक बेहतर विकल्प  उपलब्ध है। जो ज्यादा दबाव में हो, वो त्यागपत्र देकर अपने दायित्व से मुक्त हो।