ब्राइटलैंड-काण्‍ड: घर से भागा बच्‍चा अपराधी नहीं, जुझारू होता है

: सहज आक्रोश, मजबूरी और व्‍यावसायिक चोरी के बीच आप फर्क खींचिये : बच्चा मूलतः एक सरल निष्पाप, स्वच्छ और दैवीय भाव समेटे होता है : बच्‍चे हमारी जिन्‍दगी नहीं, हमारे कृत्‍यों का परिणाम :भागा बच्‍चा अपने परिवार से गुस्‍सा होता है, समाज से नहीं : ब्राइटलैंड स्‍कूल-कांड- तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह घटना शायद करीब 45 साल पहले की है। लखनऊ का एक परिवार अपने दांपत्य-विघटन का साक्षी रहा था। इस पारिवारिक विघटन का सबसे प्रतिकूल प्रभाव इस परिवार के सबसे छोटे बच्चे पर पड़ा। सही-सटीक वक्त के बारे में तो कोई खास जानकारी नहीं है, लेकिन यह उसके बचपन की घटना थी, जब पिता की डांट और पिटाई से आजिज होकर इस बच्चे को जब और कोई रास्ता नहीं दिखा, तो वह घर से भाग गया। जीआरपी में कई-कई बार उसकी बिक्री हुई, कई होटलों में उसने बर्तन धोए, वेटरी की, मजूरी की, बसों में आवाज लगा कर नेल-पॉलिश, नेल-कटर, कंघी वगैरह बेचा। वगैरह-वगैरह।

और आज वही बच्चा यूपी की पत्रकारिता जगत में एक सक्रिय और विश्वसनीय नामों में से एक माना जाता है। उसने यह ख्‍याति अपने 38 बरसों तक की अटूट-अथक मेहनत से हासिल की है।

यह सुनने के बाद आप यह जरूर जानना चाहेंगे कि आखिर वह शख्‍स है कौन। तो सुन लीजिए साहब, उस व्यक्ति का नाम है कुमार सौवीर। जी हां, यह दास्‍तान खुद मेरी ही है। यह मेरी अपनी निजी जिंदगी का वह हिस्सा है जिसे आप कहानी के तौर पर सुन रहे हैं। लेकिन इसमें कहीं भी चोरी, झूठ, व्यभिचार जैसे घृणित पक्ष शामिल नहीं है। यह बिल्कुल सीधा सादा-सा एक किस्सा है। ठीक उसी तरह, जैसे किसी गाय के थन से किसी तेज धार के साथ निकलता दूध। दुर्धर्ष साहस और जिजीविषा से सराबोर।

आज यह दास्‍तान सुनाने का मकसद सिर्फ इतना भर साबित करना है कि घर छोड़कर भागने वाला हर बच्चा अपराधी नहीं होता है। ऐसा बच्चा समाज से गुस्सा नहीं करता, बल्कि अपने परिवार के खिलाफ उठ खड़ा होता है। और अपने इस मुखालिफ अंदाज का मकसद परिवार की सारी सुख-सुविधाओं को लात मारना होता है। लेकिन इसके साथ ही साथ खुद को दुर्गति की ओर तक धकेलने का अनायास संकल्प ले बैठता है। घर से भागने का उसका मकसद किसी से कोई बदला लेना नहीं होता है, बल्कि अपने इस कदम के तहत वह अपने लिए एक नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ता जाता है। जिसमें उसके सपने भले ही न शरीक हों, लेकिन उसमें उसके गुस्से का शमन या निदान जरूर होता है।

आईपीएस अफसरों से जुड़ी खबरों को देखने के लिए क्लिक कीजिए:- बड़ा दारोगा

अपने रास्‍ते में उसे एकाध या कई ही नहीं, बल्कि बेशुमार मुश्किलातों का सामना करना पड़ता है, जो सुन कर किसी के भी रोंगटे खडे हो सकते हैं। दिल धक्‍क से रह सकता है, और अच्‍छे-खासे बहादुर के छक्‍के तक छूट सकते हैं। लेकिन यह विद्रोही-बालमन अपने परिवार के खिलाफ अपने गुस्‍से का हर कीमत पर कदम उठाता रहता है, भले ही उसके सामने कितनी भी अड़चनें ही क्‍यों न आ जाएं। वह पूरे जमाने की गालियां-लात और दुर्व्‍यवहार बर्दाश्‍त कर सकता है, लेकिन अपने परिवार से मानो उसे घृणा सी हो जाती है।उसमें अपने परिवार के खिलाफ दावानल दहकने लगता है। एक ऐसा दावानल, जो अधिकांशत: उसके संकल्‍पों की सड़क और रफ्तार के हिसाब से सार्थक तौर पर विकसित होता रहता है। लेकिन छिटपुट नादानियों को छोड़ कर बाकी अधिकांशत: मामलों में वह कपट से कोसों दूर रहता है।

इसके पहले भी मैं एक बार घर से भाग चुका हूं। चोरी नुमा गलती कर चुका हूं। एक बार जब मैं करीब 8 साल का था, तब बहराइच के विशेश्वरगंज स्थित रनियापुर-गोबरही में अपने नानी के गांव भेजा गया था। मेरा दोष था कि मैं बहुत शरारती हूं, जैसा कि मेरी मां की राय थी। मां ने मुझे नानी के यहां गांव में छोड़ दिया था। नानी शुरू से ही खडूस थीं, खाना तक नहीं देती थीं। मेरे नाना टेम्‍परेरी पोस्ट-मास्टर थे, जिनकी तनख्वाह थी 40 रूपया महीना। यह जानकारी मुझे काफी बाद में पता चली। खैर, एक दिन मैं उन की जेब से कुछ पैसे लेकर घर से भाग गया।

तो क्या मैं चोर हो गया ?

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:- पत्रकार

सहज आक्रोश, मजबूरी और व्‍यावसायिक चोरी के बीच आप कोई भी फर्क नहीं खींचेंगे। ऐसे बच्‍चे को आप अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर देंगे। अगर हां, तो मुझे इस बात का वाकई बेहिसाब हर्ष और गर्व है कि मैं आपसे पूरी तरह असहमत हूं। अपना घर छोड़कर भागने वाला कोई भी मासूम बच्चा, भले ही अपने परिवार के खिलाफ झंडा फहराते हुए घर से भाग जाता है लेकिन कभी भी समाज के खिलाफ उसके मन में कोई आक्रोश नहीं होता है।

ऐसा बच्चा मूलतः एक सरल निष्पाप, स्वच्छ और दैवीय भाव समेटे होता है। लेकिन अब आज यह कहने की जरूरत नहीं कि हम किसी भी बच्चे को किसी देवी-देवता के तौर पर मान्‍यता देना तो दूर, उसे अपनी श्रेणी तक समझने की जहमत नहीं उठाते। बच्‍चा हमारे यहां एक अवांछित प्राणी माना जाता है, जिस पर हम प्रेम तो उड़ेल सकते हैं, लेकिन उस पर आस्‍था या विश्‍वास तनिक भी नहीं। घर में तनिक भी शंका हो जाए, तो हम किसी क्रूर जल्‍लाद की तरह बच्‍चे पर पिल पड़ते हैं।

पहला सवाल तो यही होता है कि यह तुमने किया है न?

या फिर यह कि तुमने यह क्‍यों किया?

सच बात कहूं तो, बच्‍चे हमारी खुशी का साधन तो जरूर होते हैं, मगर बच्‍चों को खुश रखने की कोशिश नहीं करते हैं हम।

लखनऊ के ब्राइटलैंड स्‍कूल में पिछले तीन दिनों से जो हंगामा बरपा है, वह हमारी लुटेरी शिक्षा प्रणाली, अशक्‍त अभिभावक, गैरजिम्‍मेदार पुलिस, नाकारा प्रशासन, नपुंसक राजनीति और बकवास प्रेस-पत्रकारिता के बीच पिसते निरीह बच्‍चों के टूटते सपनों के बदतरीन माहौल का बेहद घिनौना चेहरा ही है। प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस मसले को गम्‍भीर विचार-विमर्श के बाद उसे कई कडि़यों में पिरो कर किसी फैसलाकुन नतीजे तक पहुंचाने की कोशिश की है। क्‍योंकि घर से भागा बच्‍चा अपराधी नहीं, जुझारू बनता है इसकी बाकी कडि़यों को बांचने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बाल-हृदय की गहराइयां