महादेव समर्थकों के आतंक से बेफिक्र अश्वियों ने भग और पूषा को सम्‍भाला

: महान है चिकित्‍सा जगत के महान कार्यकर्ता और भेषज-विद्वान : राजा दक्ष की यज्ञशाला में आत्‍मदाह कर बैठी थी महासती, शंकर ने किया तांडव : शंकर के प्रति अपराध की सजा पूषा के दांत तोड़ने और भग की आंख फोड़ने के तौर मिली : डॉक्टर साहब ! चलो, बुद्धम् शरणम् गच्‍छामि (तीन) :

कुमार सौवीर

लखनऊ : नागलोक के पिनाक पर्वत पर नागों की अदालत लगी थी। तेज प्रवाह और उछलती लहरों से रौद्र-वत बिन्‍दुसर के किनारे नागों का विशाल जन-समुद्र कोलाहल कर रहा था। हर कोई इस अदालत में पेश किये जा रहे अपराधियों को देखने और उन पर लानत और तबर्रा भेजने को तत्‍पर था। सभी देखना चाहते थे कि अभियुक्‍तों पर अभियोग कैसे लगाया जाएगा और कैसे उन पर कैसे सजा मुकर्रर की जाएगी।

अचानक कोलाहल शांत हुआ। पता चला कि न्‍यायाधीश वीरभद्र अपने आसन पर आ रहे हैं। सरकारी वकील को गणाग्रणी कहा जाता था। गणाग्रही ने वीरभद्र का स्‍वागत किया और फिर उन्‍हें उनके आसन तक पहुंचाया। न्‍यायाधीश वीरभद्र के बैठने के साथ ही सारे सभी सभासदों ने अपना आसन सम्‍भाला और फिर अदालत की कार्यवाही शुरू हो गयी। इसके बाद गणाग्रणी ने उस दिन की कार्यवाही के केंद्र उन अभियुक्‍तों को अदालत में पेश करने का संकेत दिया। सभी लोगों ने देखा कि सिपाहियों के पीछे रस्‍सी से बंधे पूषा और भग खींच कर लाये जा रहे हैं। पूषा और भग का पूरा शरीर थरथर कांप रहा था। उसके पैर बुरी तर‍ह डगमगा रहे हैं।

गणाग्रणी ने न्‍यायाधीश के सामने सिर झुका कर अदालत शुरू करने का अनुरोध किया। वीरभद्र के संकेत पर गणाग्रणी ने पूषा और भग का अपराध बा-आवाज-ए-बुलंद सुनाया। पता चला कि राजा दक्ष की यज्ञशाला में अपमानित की गयी सती के बारे में और महादेव शंकर के बारे में अपमानजनक और उपहासजनक बातें की थीं। जिनसे आजिज आकर सती ने राजा दक्ष की यज्ञशाला में कूद कर आत्‍मदाह कर लिया था।

इधर गणाग्रणी न्‍यायाधीश को इन दोनों के अपराध सुना रहे थे, उधर पूषा और भग उन दिनों का याद करके दहल रहे थे जब उन्‍होंने पिनाकी की मार से अपने वंशजों के सिर कटते देखा था। उस युद्ध में खुद वीरभद्र भी अपने युद्ध-कला का श्रेष्‍ठतम प्रदर्शन किया था कि पूषा और भग की जातिही दहल गयी थी। गणाग्रणी ने आरोप लगाया कि इसी पूषा ने शंकर का अपमान किया, और अट्ठहास करते हुए अपने दांत चियारे थे।

शांत वीरभद्र ने सभी से सुना, पूषा से पूछा। पूषा ने सहमति दी, और फिर शांत भाव से फैसला सुनाया:- पूषा का अपराध सिद्ध है। इस के सारे दांत तोड़ दिया जाए।

इसके बाद भग का नम्‍बर आया। गणाग्रणी ने बताया:- जब महासती पर व्‍यंग्‍य और कटोक्तियां की जा रही थीं, वहां पर खड़े इसी भग ने महासती को चिढ़ाने के लिए बार-बार अपनी  आंखें मटकायीं थीं। सती और महादेव के खिलाफ आंखें मटका-मटका करके उसने असह्य अपराध किया है।

वीरभद्र ने भग की ओर देखा। उसने क्षमायाचना के अंदाज में सिर सहमति से हिला दिया। यह देख कर वीरभद्र ने फैसला किया:- इस की आंखें फोड़ दी जाएं।

आदेश का पालन हो गया। पूषा के दांत तोड़े गये और भग की आंखें फोड़ी गयीं। इसके बाद इन दोनों का रिहा कर दिया गया।

इनके नन्‍दन पहुंचते ही पूरा देवलोक दहल गया। कोहराम मच गया। लेकिन नागों की क्षमता के सामने देव बौने थे, इसलिए खामोश ही रह गये। लेकिन इंद्र ने मलहम लगाया और कहा कि वे दोनों वैद्य-राज अश्वियों के पास जाएं।

अश्वियों के हृदय में प्राणी-मात्र के प्रति करूणा का समुद्र उमड़ रहा था। अश्‍वयों ने दोनों को दिलासा दिया और दोनों का एक-एक ओषधि पिलानी शुरू कर दिया। कुछ ही दिन में पूषा के दांत उगने लगे और भग को स्‍पष्‍ट दिखने लगा। जाहिर है कि पूषा, भग और पूरी देव-जाति में अश्वियों के प्रति अगाध श्रद्धा उमड़ गयी। देव-महर्षियों ने इसी ऋण-अहसान का सम्‍मान करते हुए अश्वियों के लिए प्रात:काल एक स्‍तुति की व्‍यवस्‍था की। इसके लिए एक विशेष सूक्‍त तैयार किया गया, जिसे केवल नन्‍दन में ही नहीं, बल्कि पूरे त्रिविष्‍टप में प्रात:काल देव और पितर अश्वियों की स्‍तुति करने लगे।

बात यहीं खत्‍म नहीं हो जाती है साहब, बल्कि इसके बाद शुरू होती है साहस और त्‍याग की अनन्‍त श्रंखला, जिसके वंशज हैं आज के डॉक्‍टर्स यानी चिकित्‍सक। दरअसल उस दौरान पूरे आर्यावर्त में नागों का आतंक चरम था। पिछले युद्ध में देव बुरी तरह हार चुके थे। नागों का सूर्य दमक रहा था, जबकि देव का सूर्य अस्‍ताचल पर था। ऐसे में अश्वियों ने नाग के अपराधियों को ओषधि देने का अपराध किया था। लेकिन इससे क्‍या। न तो अश्वियों ने नागों के आतंक के भय के सामने घुटने टेके और पूषा और भग को चिकित्‍सा उपलब्‍ध करायी। वे नागों के प्रति पूरी तरह उदासीन रहे और केवल अपने दायित्‍वों पर ही टिके रहे। उधर  नागों ने भी अपनी पूरी मानवीयता का प्रदर्शन किया और अश्वियों के काम में अड़ंगा नहीं लगाया।

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डॉक्टर साहब ! चलो बुद्धम् शरणम् गच्‍छामि