एक दिन सम्‍पादक के घर

: कानपुर, देहरादून और अमर उजाला में कानपुर, देहरादून तथा बरेली में सम्‍पादक रह चुके हैं दिनेश जुआल : लैब्राडोर तो ऐसा कूदा, मानो जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो : वाकई अर्धांगिनी। जुयाल जी के जीवन के हर लम्हे-मोड़ का हर स्पंदन, दंश और आनंद भी खूब जानती हैं :

कुमार सौवीर

देहरादून : किसी से सहमति अथवा असहमति तो अलग बहस बन सकती है। लेकिन इतना जरूर है कि दिनेश जुयाल से भेंट करना किसी को भी एक अलहदा अनुभूति करा सकता है।

बरेली के अमर उजाला में संपादक पद से रिटायरमेन्ट के बाद जुयाल जी अब देहरादून में बस गए हैं। यहां देहरादून में भी वे हिंदुस्तान दैनिक में सम्पादक रह चुके हैं। मिला, तो लगा कि मुझसे मिलने की ख्वाहिश उन्हें मुझसे ज्यादा थी। एक ही बड़े भूखंड में तीनों भाइयों के परिवार रहते हैं। सब का अलग मकान, लेकिन एक ही परिसर। रसोई भी एक।

गेट से घुसते ही दो-मंजिले मकान की सीढ़ियों पर खड़े जुयाल जी देख कर चहक पड़े। कंधे पर सवार थी एक पालतू बिल्ली, और नीचे भौंकता कुत्ता लैब्राडोर। स्वर आत्मीय। बाद में पता चला कि दोनों एक ही थाली में खाना खाते हैं, बिना गुर्राए। नो झंझट, नो लपड-झपड़।

इधर जुयाल जी से हाथ मिलाने की कोशिश की ही थी, कि बिल्ली उचक कर मेरे कांधे पर सवार हुई। बिना टिकट। लैब्राडोर तो इतना कूदने लगा, मानो जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। उम्र बमुश्किल एक बरस, मगर स्नेह और ऊर्जा का विशाल भंडार। शिशुवत।

कोई भी औपचारिकता नहीं। जिसके जो मन करे, करता रहे। कुछ देर तक मेरे कंधे पर मुफ्त सफर करने के बाद बिल्ली तो राजाजी अभ्यारण्य में रहने वाली अपनी बड़ी भांजियों ( शायद बड़ी बिल्लियों ) से भेंट-मुलाकात करने निकल गयी, लेकिन इधर कुत्ता अपने जात-बिरादरी यानी हम जैसे वाच-डॉग्स से चुहल करने लगा। रिमोट और जुयाल जी का चश्मा मुंह में दबोचना उसका खास शगल है। बेधड़की इत्ती, कि जिस प्लास्टिक वाली पाइप से उसे डांटा जाता है, उसे वह चबा लेता है।

रागिनी भाभी तो जन्मना प्रसन्न व्यक्तित्व। बिना मुस्कान के उनकी कोई भी बात शुरू ही नहीं होती। भोजन तो कुछ ऐसी खास रुचिकर प्रविधि से बनाती हैं कि कोई भी शख्स 25 फीसदी अतिरिक्त राशन उठा ले। मोटे लोग सावधान। बातचीत में अव्वल, जुआल जी की वाकई अर्धांगिनी। जुयाल जी के जीवन के हर लम्हे-मोड़ उन्हें न केवल याद हैं, बल्कि उसका हर स्पंदन, दंश और आनंद भी खूब जानती हैं भाभी। अभी कुछ दिनों से वे बीमार हैं। इसलिए हमारे आने की खबर सुनकर उनकी देवरानी किचन में जुट गई। वह भी गजब की व्यक्तित्व निकली।

दिनेश जी से लंबी बात हुई। रिकार्ड किया। वे खुलकर बोलते हैं, जो सवाल आप न पूछ पाए, उसका भी जवाब दे देंगे। बेहिचक। लेकिन कई मसलों पर साफ कह देंगे कि:-यह ऑफ द रिकार्ड है।

रात को शर्बत-ए-जन्नत हचक कर आत्मसात किया। आधा पेग एक्स्ट्रा खींच लिया मैंने। भोजन के बाद सुबह स्वादिष्ट पोहा। लैब्राडोर से नातेदारी बन ही गई थी। अब शायद उसे विदाई का अहसास हो चुका था, वह शांत लग रहा था। गम के बादल छंट जाएं, यह सोच कर मैंने चलते वक्त उसका माथा चूम लिया।

बस फिर क्या था, अपनी औकात में आ गया। आदमकद छलांगे-कुलांचें मुझ पर भरने लगा। उसकी लार से सारा कपड़ा भीगने के डर से मैं जुयाल जी के भाई की कार में झपट कर घुस गया, जो मुझे पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी परिसर छोड़ने जा रहे थे।

आधा घंटा के सफर के दौरान जुयाल जी के छोटे भाई ने मुझे पहाड़ के बारे में कई मोटी-मोटी मगर गहरी जानकारियां थमा दी।

अब बताइए, कि अब कोई कैसे भूल सकता है जुयाल जी के परिवार को।

(दिनेश जुयाल जी से कई मसलों पर मैंने लम्‍बी बातचीत की है। लेकिन लैपटॉप न होने के चलते उन्‍हें मैं अपलोड नहीं कर पाया। अब उसे विभिन्‍न विषयों पर अलग-अलग वीडियो-क्लिप लगाने की कोशिश करूंगा। )